ख़िदमात_ए_आलाहज़रत
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*🥀 ख़िदमात_ए_आलाहज़रत 🥀*
✏️ कुछ गैरों ने पूंछा आलाहज़रत को इतना क्यों मानते हो,
तो बुजुर्गों ने कहा :
कान खोल कर सुनलो,👇 ________
"शिर्क था जब नाज़ करना अहमद ए मुख्तार पर"
"नुक्ता चीं थे लोग इल्मे सैय्यदे अबरार पर"
"हर वली हर ग़ौस को बे दस्तो पा समझा गया"
"या रसूलल्लाह कहने पर था फतवा शिर्क का"
"कुफ्र पर इक दिन मशीयत को जलाल आ ही गया"
"मेरे आक़ा की मुहब्बत का सवाल आ ही गया"
"सूरतें तस्कीन की निकलीं दिले सीमाब से"
"इक किरन फूटी अचानक चर्ख पर माहताब से"
"उस किरन को अहले दीं अहमद रज़ा कहने लगे"
"मिल्लत ए खत्मुर रुसुल का पासबां कहने लगे"
"उस किरन ने राहे ईमां को मुनव्वर कर दिया"
"फूल तो हैं फूल खारों को गुले तर कर दिया"
"क़ौम के ईमानो हुरमत के निगहबां ज़िंदाबाद"
"ज़िंदाबाद ऐ मुफ्ती ए अहमद रज़ा खां ज़िंदाबाद"
"अब्रे रहमत उनकी तुरबत पर गुहरबारी करे"
"हश्र तक शाने करीमी नाज़ बरदारी करे"
इस दुनियां में बहुत कलमगार आये ,
किसी ने क़लम उठाया लैला का ज़िक्र किया,
किसी ने क़लम उठाया मजनूं का ज़िक्र किया,
किसी ने क़लम उठाया शीरी
का ज़िक्र किया,
किसी ने क़लम उठाया फरहाद का ज़िक्र किया,
लेकिन आलाहज़रत ने जब , जब क़लम उठाया किसी दुनियांदार का नहीं बल्के मदीने के ताज़दार दो आलम के मुख़्तार महबूब ए परवरदिग़ार ﷺ के बारे में ज़िक्र किया .
आप देखो तो सही क्या खूब फ़रमाते हैं आलाहज़रत :
👇🏽
उन्हें जाना ,
उन्हें माना ,
न रखा गैर से काम ,
लिल्लाह हिल हम्द मैं दुनियां से मुसलमान गया .
क़लम उठा आलाहज़रत का तो नबी ﷺ की पेशानी के बारे में लिखते हैं👇
जिसके माथे शफ़ाअत का सेहरा रहा, उस ज़बीने सआदत पे लाखों सलाम .
क़लम उठा आलाहज़रत का तो नबी ﷺ के गोशे मुबारक के बारे में लिखते हैं:👇
दूर ओ नज़दीक के सुनने वाले वो कान , काने लाले करामत पे लाखों सलाम.
क़लम उठा आलाहज़रत का लवे मुस्तफ़ा ﷺ के बारे में लिखते हैं:👇
पतली, पतली गुले क़ुद्स की पत्तियां , उन लवों की नज़ाक़त पे लाखों सलाम .
जब क़लम उठा आलाहज़रत का आमदे सरकारﷺ के बारे में लिखते हैं :👇
जिस सुहानी घड़ी चमका तैबा का चाँद , उस दिल अफ़रोज़ साअत पे लाखों सलाम.
क़लम उठा आलाहज़रत का शहर ए रसूल ﷺ के बारे में लिखते हैं :👇
हरम की ज़मीं और क़दम रख के चलना , अरे सर का मौक़ा है ओ जाने बाले .
क़लम उठा आलाहज़रत का नबी ﷺ की हयात के बारे में लिखते हैं :👇
तू ज़िंदा है वल्लाह , तू ज़िंदा है वल्लाह मेरे चश्मे आलम से छुप जाने बाले.
क़लम उठा आलाहज़रत का तो अता ए रसूलﷺ के बारे में लिखते हैं :👇
मेरे करीम से गर , क़तरा किसी ने माँगा, दरिया बहा दिए हैं दुरबे बहा दिए हैं..
क़लम उठा आलाहज़रत का तो शफ़ाअत ए रसूल ﷺ के बारे में लिखते हैं :👇
सबने शफ़े महशर में ललकार दिया हमको , ऐ बेकसों के आक़ा अब तेरी दुहाई है .
और जब क़लम उठा आलाहज़रत का तो गुम्बदे खज़रा के बारे में लिखते हैं :👇
हाजियो आओ शहंशाह का रौज़ा देखो, क़ाबा तो देख चुके , काबे का क़ाबा देखो,
👉🏽इसलिए हम सुन्नी अपने पेशवा व मोहसिन इमाम की बारगाह में खिराज ए अक़ीदत पेश करते हैं और कहते हैं👇
डाल दी क़ल्ब में अज़मते मुस्तफ़ा ,
सैय्यदी आलाहज़रत पे लाखों सलाम,
*जिनकी हर हर अदा सुन्नत ए मुस्तफ़ा,
*वो रज़ा आलाहजरत बरेली के शाह,
*मुझसे खिदमत के कुदसी कहें हां रज़ा,
*मुस्तफा जान ए रहमत पे लाखों सलाम,
*📚मसलक ए आलाहज़रत ज़िन्दा बाद📚*
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*🏁 मसलके आला हजरत 🔴*
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