आख़िर ग़लती हो कहाँ रही है
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*🥀 आख़िर ग़लती हो कहाँ रही है 🥀*
*✏️ अगर पानी का नल चालू हो और उसके नीचे कितना भी बड़ा बर्तन रखा हो वो कभी न कभी ज़रूर भर जाता है और अगर नही भरता तो समझ लीजिए कि बर्तन में छेद हो गया है जो बर्तन को भरने नही दे रहा, उसके लिए दो तरीक़े हैं या तो बर्तन को बदल दो या फिर उसका छेद बंद कर दो।*
*अगर आप ग़ौर करेंगें तो इस्लामी क़ानून के हिसाब से हर साल हज़ारों करोड़ रुपए गरीबों के लिए सदक़ा ज़कात के नाम पर निकलता है।*
*अब सवाल ये पैदा हो रहा है कि हर साल हज़ारों करोड़ रुपए अगर ग़रीबों के लिए जा रहा हैं तो फिर मुसलमानों के अंदर से ग़रीबी खत्म क्यों नही हो रही? आज भी सबसे ज़्यादा भिखारी इसी क़ौम से आते हैं और अगर ये पैसा दीनी तालीम पर ख़र्च हो रहा है तो तक़रीबन 95% मुसलमानों को दीनी तालीम में क़ाबिल हो जाना चाहिए था।* *जबकि हकीकत ये है कि दीनी तालीम तो छोड़ो बहुत बड़ी तादाद में मुसलमानों को क़ुरान शरीफ़ पढ़ना भी नहीं आता, तो आख़िर ये पैसा जाता कहां है?*
*आख़िर छेद कहां पर है कि ना तो ग़रीबी ख़त्म हो रही है और ना ही जिहालत।*
*जब तक इस छेद को ढूंढ कर इसे बंद नही किया जाएगा तब तक क़ौम के हालात नही सम्भलेंगे।*
_*उस क़ौम का मुस्तक़बिल नही बदलता,*_
_*जो क़ौम ख़ुद अपने आपको नही बदलती।*_
*इसलिए ज़रूर ग़ौर कीजिए क्योंकि बिना ग़ौर किये हुए हमारे हालात नही बदलने वाले और ना ही किसी भी तरह से हमारी नई नस्लें सुधरने वाली हैं।*
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*🏁 मसलके आला हजरत 🔴*
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