आज रात मेरी चारपाई भी सूनी ना होती

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*🥀 आज रात मेरी चारपाई भी सूनी ना होती 🥀*



✏️ *एक रात हज़रते उमर फ़ारूक़ मदीने की गलियों का चक्कर लगा रहे थे जैसा कि आप अक्सर रात को गश्त करते थे।*
*एक दफ़ा आप एक औरत के दरवाज़े से गुज़रे जो दरवाज़ा बंद किये अंदर कुछ अशआर पढ़ रही थी जिन का मफ़हूम कुछ यूँ है :*

"ये रात तवील हो चुकी है और इस के सितारे अपनी बुलंदी को पहुँच चुके हैं और मुझे इस बात ने बेदार कर रखा है कि दिल बहलाने के लिये मेरा दोस्त नहीं,
अल्लाह की क़सम, अगर उस की ज़ात ना होती तो इस चारपाई से इसके पहलू हरकत करते,
मै रात गुज़ारती ग़फ़लत में, ना ताज्जुब करती और ना किसी पे लानत करने वाली होती, बातिन लतीफ़ होता और बिस्तर उसको ना घेरता,
वो मुझसे मुख्तलफ़ अंदाज़ में दिल्लगी करता गोया रात की तारीकी में उस का अबरू चाँद की तरह ज़ाहिर हुआ, इसे खुश करता जो उसके क़रीब खेलता,
वो मुझे अपनी मुहब्बत में इताब (शिद्दत से मुहब्बत) करता और मै उसे इनाब करती लेकिन मै रक़ीब और निगरान से डरती हूँ जो हमारे नफ्सों की निगरानी करता है, जिसका कातिब कभी सुस्त नहीं होता और कभी उस से कोताही नहीं होती।"

*📚 (تفسیر در منثور، ج1، ص703، ملخصاً)*

✏️ हज़रते उमर ने अपनी बेटी से मुशावरत के बाद जंग में जाने वाले फौजियों की अपने घरों में वापस आने की मुद्दत मुअय्यन की कि ज़्यादा से ज़्यादा चार महीने तक फौजी रह सकता है उस के बाद छुट्टी ले कर अपने घर आ जाये और इस औरत के शौहर को भी वापस बुलवा लिया।

*आज भी ये अशआर पढ़े जाते हैं, पढ़ने वालों में लड़के और लड़कियाँ दोनों शामिल हैं पर सुनने वाला कोई नहीं, अगर सुन ले तो समझने से क़ासिर है।*
अगर्चे इन अल्फ़ाज़ के साथ नहीं पर ना जाने कितने ही ऐसे हैं कि इसी अकेलेपन को महसूस करते हैं पर चाह कर अपने दोस्त का क़ुर्ब हासिल नहीं कर सकते।

*निकाह में बिला किसी खास वजह के ताख़ीर की जाती है, औलाद को मजबूर किया जाता है कि मुआशरे के उसूलों के नीचे दबे लड़के और लड़कियाँ अपनी हसरतों के साथ इस अहसास को भी दबाये रखते हैं,*
*कुछ कहना तो दूर, कुछ सोचने पर भी पाबंदियाँ लगने लगी हैं, पैसों के लिये कोई सालों अपनी बीवी को अकेले छोड़ कर परदेस में रहता है,*
*कोई माल की वजह से बीवी से ही महरूम कर दिया जाता है*
*किसी के लिये निकाह मुम्किन हो कर ना-मुम्किन जैसा है तो किसी को उम्मीद भी अब नज़र नहीं आती।*

*काश कि लोग समझें कि ये ऐसी ज़रूरत है कि जिस का इंकार असल में फ़ितरत की मुख़ालिफ़त होगी।*
*हम इशारतन ही कहते हैं कि आसानियाँ पैदा करें, आसानी से मिलने दें, जियें और जीने दें ताकि किसी की साँसों के साथ ऐसे अशआर बुलंद ना हो वरना जब किसी को तकलीफ होती है तो ये सिर्फ उसी के साथ खास नहीं होती बल्कि इस का असर हमारी सोच से ज़्यादा दूर तक असर करता है।*

*🤲 अल्लाह त'आला हमारे हाल पे रहम फ़रमाये, बेशक वो बड़ा रहीम है।*

     

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*🏁 मसलके आला हजरत 🔴*

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